इन्द्रियां पर दृष्टा भाव कैसे रखें?

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेयशीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्वभारत॥

इस श्लोक में समता के महत्व को बताते हुए पूरी साधना विधि का उल्लेख करते हैं| समता अर्थात संसार की जैसी भी परिस्थिति क्यों ना आए परिस्थितियों में एकत्व भाव बनाए रखना| सुख आए तो खुशी से उछलना और ना दुख आने पर उसे प्रभावित हो दुखी हो जाना |

आप समता कैसे करनी है उनकी पूरी साधना विधि यहां भगवान बता रहे हैं| यहां इंद्रियों से संपर्क में आने वाले विभिन्न वस्तुओं से एक स्पर्श होता है | उदाहरण स्वरुप बाह्य आवाज जैसे कि कान की इंद्रियों पर आती है शब्द रूपी तनमात्राएं आत्मसात करके उसके विषय में चित्त चिन्तन करता है और राग द्वेष मैं उलट- पूलोत करता है |इसी प्रकार दूसरी इंद्रियां जैसे नेत्र, जीभ , नाक, अपने अपने तन मात्राएं रूप से स्पर्श और गंध को ग्रहण कर निरंतर प्रतिक्रिया करते रहते हैं |

भगवान इस क्षमता की साधना में तनमात्राओं से अप्रभावित रहने की बात करते हैं क्योंकि यह सारे इंद्रियों के प्रभाव मात्र कुछ देर के लिए रहते हैं अर्थात वह सारे अनित्य-धर्मा हैं और सदा परिवर्तनशील है|
मनुष्य जब यह बोध कर लेता है तो मात्र उनको तीतेक्षापूर्वक केवल देखता है | यहां भगवान वस्तुतः दृष्टा भाव का उपदेश दे रहे हैं क्योंकि समता की साधना बिना दृष्टाभाव के नहीं हो सकती है |

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